भोपाल । चुनौतियां कितनी भी बड़ी होंयदि उनसे सबक लिया जाए तो आत्मविश्वासतरक्की और आत्मनिर्भरता के रास्ते खुलते ही हैं। यही हुआ मध्य प्रदेश में कोरोना की दूसरी लहर की दुश्वारियों के बाद। वर्ष 2021 के समापन में कुछ ही दिन शेष हैंलेकिन अब भी उस समय को भूल पाना बेहद कठिन है जब अस्पतालों में एक-एक बिस्तर के लिए 10 से 15 लोग प्रतीक्षा में रहते थे। आक्सीजन सिलिंडर के लिए कतारें लगी रहती थीं। जिसको एक सिलिंडर भी मिल गया वह ईश्वर को धन्यवाद देता था। स्थिति इतनी विकट थी कि कई मरीजों ने समय से आक्सीजन नहीं मिलने के कारण दम तोड़ दिया। आंखों में आंसू लिए मरीजों के स्वजन इस अस्पताल से उस अस्पताल भटकते थे। गिड़गिड़ाते थे कि किसी तरह उनके मरीज के लिए एक बिस्तर मिल जाए। दूसरी लहर में कोरोना के मामले अचानक बढ़ने से सरकार को संभलने का मौका ही नहीं मिला।

सरकार ने आनन-फानन में संसाधन तो बढ़ाएलेकिन जिस तरह से जरूरत बढ़ी उसके सामने सारी व्यवस्थाएं छोटी पड़ती गईं। आक्सीजन का तो ऐसा संकट  गया था कि हवाई जहाज से टैंकर मंगाने पड़े थे। प्रदेश सरकार की उस समय सांसें फूल गईं थीं जब महाराष्ट्र सरकार ने आक्सीजन देने से मना कर दिया था। यही वह समय था जब सरकार ने तय कर लिया कि आर्थिक संकट एवं अन्य दुश्वारियों से लड़ते हुए भी वह चिकित्सा सुविधाओं के विकास एवं विस्तार पर ध्यान केंद्रित करेगी। उसने आक्सीजन के उत्पादन में प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने का खाका तैयार कर लिया। इसे अमलीजामा पहनाने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए गए।

कोरोना की दूसरी लहर में हर दिन 150 मीट्रिक टन आक्सीजन की जरूरत पड़ती थी। अब स्थिति यह है कि आक्सीजन का पर्याप्त उत्पादन होने लगा है। प्रदेश के हर जिले में मेडिकल आक्सीजन के उत्पादन के लिए जेनरेशन प्लांट लगाए गए हैं। प्रदेश में कुल 202 प्लांट लगाए जाने थेजिनमें 180 पूरी तरह से तैयार होने के बाद शुरू हो चुके हैं। इन 202 प्लांटों से हर दिन 230 मीट्रिक टन आक्सीजन तैयार हो सकेगी। इससे आइसीयू में भर्ती करीब आठ हजार मरीजों की आक्सीजन की जरूरत एक समय में पूरी हो सकेगी। आक्सीजन की कमी दूर करने के लिए 14,501 आक्सीजन कंसंट्रेटर की व्यवस्था भी की गई है। साथ ही तरल आक्सीजन की भंडारण क्षमता भी अस्पतालों में दो गुना तक बढ़ाई गई है। मेडिकल कालेजों में तरल आक्सीजन के भंडारण की क्षमता 275 किलोलीटर से बढ़ाकर 395 किलोलीटर कर दी गई है।

कोरोना की दूसरी लहर में महामारी से निपटने के लिए जिला अस्पतालों की कमजोरी उजागर हुई थी। छोटे जिलों-कस्बों से मरीज इंदौरभोपालग्वालियरजबलपुर के अस्पतालों में भाग रहे थेलेकिन वहां भी गंभीर मरीजों को राहत नहीं मिल पा रही थी। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जिला अस्पतालों में संसाधन किस तरह से सुदृढ़ किए जाएं ताकि कोरोना ही नहीं किसी भी तरह की आपदा से निपटना आसान हो जाए। पिछले साल मार्च में कोरोना की दस्तक के दौरान प्रदेश के जिला अस्पतालों में आइसीयू बेड नहीं थे। अब सभी जिला अस्पतालों में मिलाकर 580 बिस्तर के आइसीयू बेड तैयार किए गए हैं। सभी आइसीयू में वेंटिलेटर और अन्य उपकरण भी उपलब्ध हो चुके हैं। इसी तरह कोरोना के शुरुआती दौर में सभी जिला अस्पतालों को मिलाकर कुल 102 वेंटिलेटर थे। बाद में केंद्र सरकार ने 100 वेंटिलेटर उपलब्ध कराए और प्रदेश सरकार ने भी वेंटिलेटर की खरीद की है। इस तरह अब 250 से ज्यादा वेंटिलेटर प्रदेश के जिला अस्पतालों में हो गए हैं। इसका बड़ा फायदा यह होगा कि कोरोना नहीं भी रहे तो दूसरी बीमारियों के मरीजों को इन अस्पतालों में आइसीयू में भर्ती किया जा सकेगा। उन्हें मेडिकल कालेज रेफर करने की नौबत नहीं आएगी।

सरकार ने संक्रमण की तीसरी लहर को ध्यान में रखते हुए मेडिकल कालेजों से लेकर छोटे अस्पतालों तक में आक्सीजन बेडआइसोलेशन बेड और एचडीयूआइसीयू बेड बढ़ा दिए हैं। पिछले साल अप्रैल में जहां प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में आक्सीजन बेड 5,716 थेवहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 14,260 तक पहुंच गई है।